Thursday, 9 March 2017

मैं सुबह उठा और प्रात भ्रमण के लिए निकला । नए शहर में अकेले भ्रमण करने में मुझे विशेष आनंद मिलता है । बीते शाम को संतोष जी के साथ शहर के चारों ओर चक्कर लगा चुका था । तो कौन सी सड़क किधर जाती है ? और किधर क्या है ? यह सब जानकारी हो गई थी । मैं होटल से निकला और ब्रह्मपुत्र नदी की ओर चल दिया । कुछ दूर चलने के बाद मैं जेल की ओर मुड़ गया । आगे जाने पर मुझे रास्ते में कुछ बच्चे जोगिंग करते हुए मिले । हंसते मुस्कुराते हुए मैं भी उन बच्चों के साथ धीरे-धीरे दौड़ने लगा। आगे एक चौराहा मिला वहां से बच्चे वापस मुड़ गया और मैं वहां से दाहिने की ओर मुड़कर आगे चलते गया ।कुछ दूर चलने पर मै अग्निगढ़ के सामने पहुँच गया ।अभी यह खुला नही था मै यहाँ नहा धोकर फिर आऊगाँ। यहाँ से बाँये हाथ की ओर एक रास्ता जाता है उधर एक लोग जा रहे थे । मैने उनसे बात किया तो वह बताया कि पहाड़ी पर एक नयी पानी टंकी बन रहा है वही काम करता हूँ । तो उसके साथ मै भी चल दिया । वहाँ जाने पर मैने देखा कि एक बहुत बड़ी पुरानी हो चुकी कंक्रीट की पानी टंकी अवस्थित है । उसके बदले एक नयी टंकी का अधार की पीलर बनाने का काम चल रहा है ।वही से बायी ओर थोडी ऊपर एक बन्द फाटक दिखाई दिया । तो मै उसे देखने उसके अन्दर टूटी हुई तार की दिवार से प्रवेश किया । अन्दर जाने पर मुझे लगा कि यह सरकारी स्वस्थ केन्द्र है जो अभी बन्द पड़ा हुआ है ।सामने ब्रह्मपुत्र नद एकदम शान्त भाव से बह रहा था ।{ब्रह्मपुत्र को भगवान ब्रह्मा जी का पुत्र माना जाता है अतः सिर्फ यही एक नदी न होकर नद (पुरूष) माना जाता है। }। वहाँ से वापस मै नीचे आ गया और सीधे आगे चलने पर चित्रलेखा उद्यान मिला।माना जाता है कि यही पर द्वापर युग मे बाणसूर और श्रीकृष्ण के बीच युद्ध हुआ था। अभी वहाँ एक सुन्दर सा उद्यान है जहाँ बोटिंग और झूले आदि का अच्छा प्रबंध है । शहर के लोगो के लिए बहुत ही अच्छा व्यवस्था है ।मै टहलते हुए आगे बढ गया । कुछ कदम चलने के बाद जहाज घाट पहुँचा । यह घाट जलमार्ग द्वारा मालढूलाई के समय बहुत चहल - पहल होती होगी, ऐसी वहाँ की स्थिति देखकर लगा। लेकिन अभी वीरान पड़ा हुआ । आजकल जलपरिवहन बहुत कम हो गया है सिर्फ शौकिया तौर पर सैर के लिए ही नाव चलते है । आगे चलते हुए मै गणेश घाट पहुँचा । यहाँ पर एक बहुत पुरानी गणेश जी की प्रतिमा है । यहाँ दाहिने ओर मुड़ कर मै मुख्य मार्ग पर आ गया । और अब लगभग  डेढ़ घण्टे हो चुके थे टहल कदमी करते हुए तो मै अब सीधे होटल आया ।नहा धोकर तैयार होकर नास्ते किया और लगभग 09:00 बजे मै अग्निगढ़ देखने के लिए निकल गया ।प्रवेश टिकट लेकर मै पतली  पतली सीमेन्ट से बने पगडन्डी पर चलते हुए इस छोटी सी पहाडी की चोटी पर पहुचा ।चोटी से ठीक नीचे एक जगह पर भगवान शिव और श्रीकृष्ण के युद्ध को दर्शाता हुआ प्रतिमा बना हुआ है और इससे नीचे शिवी जी का ध्यान मुद्रा मे एक प्रतिमा स्थापित है । सबषे ऊपर चोटी पर चित्रलेखा, उषा को उसकी स्वपन मे आये युवक अनिरूद्ध का चित्र बनाते हुए मूर्ती बनी है ।इसी चोटी पर उषा को कैद करके रखा था ।चोटी पर ही एक छोटा सा दृश्य केन्द्र (भीव्य पाइन्ट )(मुझे इसका सटीक हिन्दी शब्द नही मिला) बना है।यहाँ से तेजपुर शहर का सुन्दर दृश्य दिखता है । यह एक छोटा  सा शहर है मुख्य बाजार छोडकर खूब हरियाली दिखती है ।सामने एक बार फिर शान्त बहता ब्रह्मपुत्र का दृश्य बहुत ही मनोरम लग रहा था । मानसून के ऋतु मे यही नदी इस प्रदेश को अपने साथ लाये अथाह जलराशि से प्रलय मचाती है पर कभी भी तेजपुर शहर मे इसका प्रलय का कोई प्रभाव नही होता  । क्योकि यह शहर छोटी छोटी टिलानूमा पहाडो पर बसा है ।यहा तक प्रलयकारी पानी पहुँचता ही नही ।मै यही पर बन कलाकृति को देख कर सोच रहा हूँ कि हमारी संस्कृति विरासत और पौराणिक ग्रंथ हमे  अपनी वृहद भारत को दिखाती समझाती है लेकिन आज के व्यवस्था और मानसिकता हमे नजदिक आने की मौका देता ही नही है । कहाँ द्वारिका देश के पश्चिमी छोर और कहाँ तैजपुर देश का पूर्वी छोर ।यही सब  विचार मेरे मन चल रहा थे तब तक संतोष जी फोन किये उन्हे मै बताया कि मै अग्निगढ़ मे हूँ । कुछ देर मे वे यहाँ आये और मै भी अब आगे देखने के लिए नीचे उतरा।






2 comments:

  1. आपका लेख सुहाना लगा

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  2. धन्यवाद । संजय जी ।

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